नील आर्मस्ट्रांग की जीवनी Neil Armstrong Biography In Hindi ,चंद्रमा पर पहला कदम रखने वाले.
नील आर्मस्ट्रांग की जीवनी Neil Armstrong Biography
नील आर्मस्ट्रांग अंतरिक्ष वैज्ञानिक- पहले चाँद पर जाना सपनों की बात थी, लेकिन मेहनत और संघर्ष से सपने सच हो जाते हैं. चाँद पर जाने की कल्पना को नील आर्मस्ट्रांग ने सच कर दिखाया.
उन्होंने जुलाई 1969 में चाँद पर अपने कदम रख दिए. नील आर्मस्ट्रांग एक अमेरिकी यात्री थे. उनका जन्म 5 अगस्त 1930 को आग्लैज देश के ओहियो के वापकोनेता में हुआ था.
नील आर्मस्ट्रांग बहुमुखी प्रतिभा के स्वामी थे. वे एक एरोस्पेस इंजीनियर, नौसेना विमान चालक, टेस्ट पायलट और युनिवर्सिटी के प्रोफेसर थे.
अंतरिक्ष यात्रा पर जाने से पहले वे अमेरिका के नेवी ऑफिसर थे.उन्होंने कोरियाई युद्ध में अपनी सेवाए दी थी.
युद्ध के बाद उन्होंने पुरदुर युनिवर्सिटी से बैचलर की उपाधि प्राप्त की और हाई स्पीड फ्लाईट स्टेशन नेशनल एडवाइजरी कमेटी फॉर एयरोनोटिक्स यानी कि नासा के टेस्ट पायलट के पद पर रहकर अपनी सेवाए दी.
नील आर्मस्ट्रांग बहुमुखी प्रतिभा के स्वामी थे. वे एक एरोस्पेस इंजीनियर, नौसेना विमान चालक, टेस्ट पायलट और युनिवर्सिटी के प्रोफेसर थे.
अंतरिक्ष यात्रा पर जाने से पहले वे अमेरिका के नेवी ऑफिसर थे.उन्होंने कोरियाई युद्ध में अपनी सेवाए दी थी.
युद्ध के बाद उन्होंने पुरदुर युनिवर्सिटी से बैचलर की उपाधि प्राप्त की और हाई स्पीड फ्लाईट स्टेशन नेशनल एडवाइजरी कमेटी फॉर एयरोनोटिक्स यानी कि नासा के टेस्ट पायलट के पद पर रहकर अपनी सेवाए दी.
उस समय वे नासा के पहले अंतरिक्ष यात्री बने थे. पहले उन्होंने डेविड स्कोट के साथ उड़ान भरी, लेकिन उनकी यह उड़ान बाद में रद्द कर दी. इसके बाद आर्मस्ट्रांग की दूसरी और अंतिम स्पेस फ्लाईट कमांडर के रूप में अपोलो 11 थी.
पहली फ्लाईट जुलाई 1969 में चाँद पर उतरी थी. पर वर्ष 1969 में आर्मस्ट्रांग को चाँद पर पहुचने के लिए अनेक मुश्किलों और कठिन परिस्थतियों का सामना करना पड़ा था. उनके साथ नासा के पहले चन्द्रयान का हिस्सा बनने वाले माइकल कालिंस और एडविन ई बज्ज भी थे.
इन तीनो की तिकड़ी 16 जुलाई 1969 को अंतरिक्ष पहुची थी. मिशन कमांडर आर्मस्ट्रांग ने 20 जुलाई 1969 को चन्द्रमा की सतह पर चलकर देखा भी था. उनके सहकर्मी कॉलिन्स कमांड मोड्यूल में ही बैठे रहे थे.
आर्मस्ट्रांग ने चंद्रमा मोड्यूल से बाहर निकलकर कहा था, इंसान का यह छोटा सा कदम मानव जाति के लिए एक बहुत बड़ी छलांग हैं. यह बात सही भी थी. उसके बाद से अनेक देशों के अंतरिक्ष यात्री चाँद पर अपने कदम रख चुके हैं.
नील आर्मस्ट्रांग के साथ ही कालिंस और एलिड्रिन को अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने प्रेसिडेशियल मेडल ऑफ फ्रीडम अवार्ड से सम्मानित किया.
82 साल की उम्रः में 25 अगस्त 2012 को चन्द्रमा के पहले अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग ने अंतिम सांस ली. आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जब तक सूरज चाँद रहेगा, तब तब नील आर्मस्ट्रांग को चंद्रमा पर कदम रखने वाले पहले अंतरिक्ष यात्री के रूप में याद किया जाता रहेगा.
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पूरा
नाम |
नील एल्डन आर्मस्ट्रांग |
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जन्म |
5 अगस्त 1930, वेपकॉनेटा |
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मृत्यु |
अगस्त 25,
2012 (उम्र
82) |
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शिक्षा |
बी॰एस, एम॰एस॰ |
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प्रसिद्धि
कारण |
प्रथम चन्द्र्यात्री |
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पुरस्कार |
प्रेजिडेंटल
मैडल ऑफ फ्रीडम, कॉंग्रेसनल स्पेस मैडल
ऑफ ऑनर |
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नागरिकता |
अमेरिकी |
चन्द्रमा पर आर्मस्ट्रांग
20 जुलाई 1969 की रात को ठीक आठ बजे अपोलो चाँद की सतह पर सफलतापुर्वक उतर गया. इससे पूर्व अपोलो 11 के हिस्से कोलंबिया को ईगल से अलग किया गया. ईगल पर नील आर्मस्ट्रांग और बज आल्ड्रिन ईगल सवार हुए तथा माइक कोलिंस कोलम्बिया पर ही रुके.
चाँद पर लैंडिंग के कई घंटे बाद 21 जुलाई को 2:56 बजे नील आर्मस्ट्रांग ने पहले मानव के रूप में चाँद पर कदम रखा उनके कुछ देर बाद आल्ड्रिन चाँद की सतह पर आए. दोनों ने करीब 21 घंटे और 31 मिनट का समय यहाँ व्यतीत किया. इस दौरान दोनों ने चाँद की मिट्टी के नमूनों को एकत्र भी किया.
तय समय पर दोनों ने अपना मिशन पूरा करने के बाद ईगल में सवार हुए और कोलंबिया से जुड़ने के लिए चल पड़े थे. ईगल में कम इंजन के बावजूद दोनों का जुड़ाव हुए और 24 जुलाई 1969 को तीनो अंतरिक्ष यात्री सकुशल लौट आए.
कहते हैं न भाग्य भी साहसी लोगों का साथ देता हैं नील आर्मस्ट्रांग की इस कहानी में भी कई बार ऐसा हुआ. जब अपोलो को पृथ्वी से लोंच किया गया तो थोड़ी देर बाद ही इसका धरती से सम्पर्क कट गया था मगर चाँद की कक्षा में पहुचते ही यह पुनः बहाल हो गया था.
धरती पर लौटते समय उनका यान प्रशांत महासागर में गिरा परन्तु सकुशल इनको निकाला गया तथा अगले 21 दिनों तक क्वारंटीन भी रखा गया ताकि उन पर किसी बाहरी सक्रमण के प्रभाव की जाँच की जा सके.
अपोलो 11 मिशन और नील आर्मस्ट्रांग
21 जुलाई, 1969 को नील आर्मस्ट्रांग ने अपने सहयोगियों के साथ चंद्रमा पर कदम रखा, यह सफलता की कहानी महज एक अंतरीक्ष यात्री की सफल उड़ान की नहीं थी, बल्कि लाखों वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत और करोड़ों लोगों के आस और विश्वास से भी जुड़ी थी.
16 जुलाई 1969 को अपोलो-11 को पृथ्वी से रवाना किया गया तथा यह 21 जुलाई को 2:56 बजे चन्द्रमा पर सकुशल पहुंचा. महज इन चार दिनों के पीछे का यत्न और उसकी कहानी बड़ी रोचक और जानने योग्य हैं.
सोवियत संघ के यूरी गगारिन ने 1961 में अंतरीक्ष यात्रा के साथ ही अब अमेरिका और नासा के समक्ष प्रतिष्ठा बचाने का प्रश्न खड़ा हो गया था. सोवियत की इस सफलता के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी ने यह घोषणा कर दी कि वे अब चाँद पर मानव को भेजकर उन्हें सकुशल पृथ्वी पर लेकर आएगे.
नासा के करीब पांच लाख वैज्ञानिक दस वर्षों के लिए इस प्रोजेक्ट पर लगाये गये और चौबीसों घंटे कड़ी परिश्रम की गई. वैज्ञानिकों के सामने पहली चुनौती एक ऐसा अंतरिक्ष यान और राकेट तैयार करना था जो चाँद तक जाकर पुनः लौट आने में सक्षम हो.
करीब 6 वर्षों के परिश्रम के बाद लूनर मॉड्यूल बना, तथा बेहद शक्तिशाली इंजन कबशन भी तैयार हो गया. इसकी गुणवत्ता के परीक्षण के लिए लगभग सात बार इसका सफल परीक्षण किया गया.
नासा ने जैमिनी प्रोजेक्ट 1961 में लौंच किया तथा 1966 तक करीब दस बार मनुष्यों को पृथ्वी की कक्षा तक भेजकर वापिस लाया गया. इस दौरान 27 जनवरी, 1967 को अपोलो-1 लोंच किया गया मगर यान में आग लगने के कारण तीन वैज्ञानिक मारे गये तथा यह पहला प्रयास विफल हो गया.
नासा ने 1966 आते आते राकेट और यान तो तैयार कर लिया मगर अब उनके सामने समस्या यह थी कि आखिर इस अभियान पर किन व्यक्तियों को भेजा जाए. क्योंकि ऐसे साहसिक अभियानों में अनुभवी पायलटों का चुना जाना बेहद जरूरी था.
अतः नेवी और एयर फ़ोर्स के 15 टेस्ट पायलटों को अभ्यास के लिए चुना गया जिनमें से तीन पायलटों को चन्द्र मिशन के लिए चुना जाना था. आखिर छटनी के बाद नील आर्मस्ट्रांग, बज आल्ड्रिन और माइक कॉलिंस को चुना गया.
16 जुलाई, 1969 को केनेडी स्पेस सेंटर से अंतरराष्ट्रीय समयानुसार दोपहर 1:32 बजे को वह घड़ी आ चुकी थी जब सैटर्न 5 रोकेट से नील आर्मस्ट्रांग अपने साथियों के साथ चाँद की यात्रा पर रवाना हुए/
टीवी पर लाइव प्रसारित हुए इस अभियान को अपनी आँखों से देखने के लिए लाखों की भीड़ केनेडी स्पेस सेंटर की साईट पर आ पहुची थी. अपोलो 11 को जब लोंच किया गया तो इसकी गरज इतनी भयंकर थी कि आस पास की सारी इमारते एक बार के लिए डोल उठी थी.
19 जुलाई, 1969 के दिन अपोलो नील आर्मस्ट्रांग और दो साथियों समेत जैसे ही चाँद की कक्षा में दाखिल हुआ, नासा के वैज्ञानिकों के सामने एक और समस्या खड़ी थी. वह थी चाँद पर सुरक्षित लैंडिंग.
चाँद को यान से देखने पर उबड खाबड़ और पहाड़ियों और गहरें गड्डों के रूप में दिख रहा था. नासा ने छः साल की मेहनत के दौरान कई सेटेलाइट चाँद पर भेजकर कुछ इमेजेज भी प्राप्त की थी, जिसके द्वारा एक सुरक्षित स्थान को भी पहचाना गया जहाँ अपोलो 11 को लैंड किया गया.
नील आर्मस्ट्रांग से जुड़े कुछ तथ्य:
- 20 जुलाई, 1969 को मानव इतिहास का पहला दिन था जब नील ने चन्द्रमा पर कदम रखा था.
- अपने जीवनकाल में इन्होने अनेकों तरह की उड़ानों में भाग लिया, चार हजार किमी घंटा की रफ्तार से उड़ने वाले एक्स 15 से लेकर कई रोकेट और ग्लाइर भी शामिल थे.
- नील के पिता एक सरकारी ओडिटर थे, इनका बचपन पिता के तबादलों के चलते कई शहरों में व्यतीत हुआ था.
- आर्मस्ट्रांग जब पांच बरस के थे उस समय उन्होंने पहली एरोप्लेन की सवारी 1936 में की थी.
- इनका जन्म 5 अगस्त 1930 को हुआ था, नील के पिता का नाम स्टीफेन आर्मस्ट्रांग था और माँ का वायला लुई एंजेल थीं.
- नील ने अमेरिकी सेनाओं के लिए भी काम किया था तथा कुछ युद्धों में भी भागीदारी निभाई.
नील आर्मस्ट्रांग से इंदिरा गांधी की मुलाकात
20 जुलाई 1969 के सवेरे 4 बजकर 30 मिनट का समय था, जब पूरी दुनिया टकटकी लगाकर एक ऐतिहासिक पल की साक्षी बन रही थी. उन बेताबी के पलों का जगकर इतंजार करने वालों में से एक भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी भी थी.
यह वाक्या पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अपनी किताब में किया हैं. घटना उन दिनों की हैं जब आर्मस्ट्रांग और एल्ड्रिन अपोलो 11 की चाँद पर अभूतपूर्व सफलता के बाद एक विजयी हीरों के रूप में दुनिया भर की यात्राओं पर थे. इस दौरान नील आर्मस्ट्रांग भारत दौरे पर भी आए और इंदिरा गांधी से उनकी मुलाक़ात हुई.
दोनों के बीच बातचीत में गांधी ने यह भी कहा था कि वो चन्द्रमा पर नील के कदम रखने के पल का साक्षी बनना चाहती थी, इस कारण वह चार बजकर 30 तक जगती रही. इस पर नील ने बड़ी विनम्रता से कहा था मैडम आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद हैं, हम अपने अगले मिशन में आपको यह तकलीफ नहीं देने वाले हैं.
हालांकि नील आर्मस्ट्रांग फिर से चाँद की यात्रा पर नहीं गये थे. स्वेच्छा से नील आर्मस्ट्रांग ने 1971 में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा से सेवानिवृत्त हो गये और स्पेस इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराने लगे थे.
मृत्यु
मानव जाति के इतिहास में सम्भवत सबसे करिश्माई अभियान को अंजाम देने वाले नील आर्मस्ट्रांग 82 वर्ष की आयु में 25 अगस्त 2012 को बाईपास सर्जरी के चलते इस लोक को अलविदा कह गये.
एक अंतरिक्ष यात्री, पायलट के रूप में इनका जीवन बेहद संयमित और उपलब्धियों से लबरेज था, उन्हें कई खिताबों से नवाजा गया, मगर चाँद पर पहले मानव के कदम की निशानी इनकी थी, इनका यह साहसिक कार्य सभी खिताबों से बढ़कर था जो सदियों तक याद किया जाता रहेगा.
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